Jaane naa kahan woh duniya hai...
jaane naa woh hai bhi yaa nahi...
jahan meri zindagi mujhse...
itni khafaa nahi...
This world amazes & disgusts me at the same time so here I am to share my world with you through my eyes...

Tuesday, September 30, 2008

Nostalgia

बीवी, बहु, बुआ, चाची, मामी, मौसी ना बनकर एक दिन फिर सिर्फ बिटिया बनना चाहती हूँ,
अपने बचपन के दिनों को फिर एक दिन जीना चाहती हूँ...
सुबह सात बजे फिर एकबार स्कूल जाना चाहती हूँ,
अलार्म की नहीं, माँ की पुकार सुनके उठाना चाहती हूँ...

रिसेस में फिर सहेलियों के साथ गप्पे मारना चाहती हूँ,
पुरानी रिक्शा में फिर अन्ताक्षरी खेलते हुवे घर लौटना चाहती हूँ...
माँ के हाथ के गरम फुल्के फिर एक बार खाना चाहती हूँ,
माँ के बगल में लेट के फिर सारी दोपहर बातें करना चाहती हूँ...
गुडिया की शादी में माँ की चुनरी ओढ़के नाचना चाहती हूँ,
शाम को सहेलियों के साथ फिर सायकिल पे सैर करने जाना चाहती हूँ...

पापा के साथ बैठके फिर होमवर्क करना चाहती हूँ,
दादा-दादी के पास बैठके फिर कहानियां सुनना चाहती हूँ...

माँ की लोरी और पापा की थपकियों से फिर सोना चाहती हूँ,
अपने बचपन के दिनों को फिर एक दिन जीना चाहती हूँ...
बीवी, बहु, बुआ, चाची, मामी, मौसी ना बनकर एक दिन फिर सिर्फ बिटिया बनना चाहती हूँ...

1 comment:

सुनील सुयाल said...

कागज की किस्ती थी ,पानी का किनारा था ! खेलने की मस्ती थी, दिल ये आवारा था ! कहाँ आ गये इस समझदारी के दलदल मै ! वो नादान बचपन ही कितना प्यारा था ! आपकी व्यथा हर बड़े के मन की व्यथा है