बीवी, बहु, बुआ, चाची, मामी, मौसी ना बनकर एक दिन फिर सिर्फ बिटिया बनना चाहती हूँ,अपने बचपन के दिनों को फिर एक दिन जीना चाहती हूँ...
रिसेस में फिर सहेलियों के साथ गप्पे मारना चाहती हूँ,
पुरानी रिक्शा में फिर अन्ताक्षरी खेलते हुवे घर लौटना चाहती हूँ...
माँ के हाथ के गरम फुल्के फिर एक बार खाना चाहती हूँ,
माँ के बगल में लेट के फिर सारी दोपहर बातें करना चाहती हूँ...
पुरानी रिक्शा में फिर अन्ताक्षरी खेलते हुवे घर लौटना चाहती हूँ...
माँ के हाथ के गरम फुल्के फिर एक बार खाना चाहती हूँ,माँ के बगल में लेट के फिर सारी दोपहर बातें करना चाहती हूँ...
शाम को सहेलियों के साथ फिर सायकिल पे सैर करने जाना चाहती हूँ...
पापा के साथ बैठके फिर होमवर्क करना चाहती हूँ,
दादा-दादी के पास बैठके फिर कहानियां सुनना चाहती हूँ...
माँ की लोरी और पापा की थपकियों से फिर सोना चाहती हूँ,
अपने बचपन के दिनों को फिर एक दिन जीना चाहती हूँ...
बीवी, बहु, बुआ, चाची, मामी, मौसी ना बनकर एक दिन फिर सिर्फ बिटिया बनना चाहती हूँ...

1 comment:
कागज की किस्ती थी ,पानी का किनारा था ! खेलने की मस्ती थी, दिल ये आवारा था ! कहाँ आ गये इस समझदारी के दलदल मै ! वो नादान बचपन ही कितना प्यारा था ! आपकी व्यथा हर बड़े के मन की व्यथा है
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